Wednesday, September 29, 2010

nature

प्रेम !
चाहत नहीं सम्मान की होए भले अपमान,
क्या खोया ?क्या पाईया नहीं प्रेम पैमान!
मन का अँधियारा मिटा जीवन बना महान,
लगन की लौ अन्दर !जगी दीप प्रेम तू जान ?
छमा समायी प्रेम में अतुलित बल की खान,
हर विपदा पल में हटे प्रेम ले जो ठान,
प्रेम मन की कल्पना साहस भरी उडान,
सत्य उचाई का शिखर छोटा लगे जहान,
प्रेम है एक आराधना सफल साधना ज्ञान,
बिना प्रेम के सत्य कह संभव नहीं पिय ध्यान!

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