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memory of nature''

तुम्हारा स्पर्श '' शून्य-नेत्रों से गिरी बूँद रश्मि-स्रोतों से प्रथम साक्षात्कार दीर्घ-साधना की अनन्य उपलब्धि तुम्हारा स्पर्श आत्म का स्फुरण विशुद्ध चेतना-कंठ में कम्पित प्रार्थना-स्वर अचेतस को तत्क्षण चेतस-बुद्धि। तुम्हारा स्पर्श पुष्प-कलि के विकसन का आमोद स्थैर्य को निरन्तरता का सूत्र आनन्द की विभोरता का लघु-प्रहसन तुम्हारा स्पर्श रूठेपन का मधु-स्मित-अनुरोध सहज भाव-नर्तन का चित्र-विचित्र 'मैं'-'तुम' विलयन का सहज संचरण।

Thursday, May 24, 2012

kuch pal khayalon ke!

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Posted by prakriti at 12:02 PM 1 comment:
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nature''

दर्द हमारा सगा सहोदर,और वेदना है सहगामीदिन प्रतिदिन अपनी पीड़ा कीहम करते खुद ही नीलामी,बोली जिन लोगों ने बोली-हम उनके भी हैं आभारी!

कभी-कभी तो मन रोता हैपर बाहर हँसना पड़ता हैजीवन भर की कड़ी कसौटी-में खुद को कसना पड़ता है,हम जंगल के पारिजात हैं-काँटों में ही रहन हमारी

मोलभाव की इस दुनिया में,कीमत का बाज़ार है सारा।घाटे में रह करके अब भी,मूल्यों पर विश्वास हमारा।फिर भी दाग लगा जाती है,यह काजर की कोठी कारी!

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क्षण भर और रहने दो मुझे अभिभूत फिर जहाँ मैंने सँजो कर और भी सब रखी हैं ज्योति: शिखाएँ वहीं तुम भी चली जाना शांत तेजोरूप। एक क्षण भर और : लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते। बूँद स्वाती की भले हो बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को भले ही फिर व्यथा के तम में बरस पर बरस बीते एक मुक्ता-रूप को पकते।
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