Wednesday, September 29, 2010

आसमान के छोटे से टुकड़े ने, मुझे फिर से लुभाया।अरे! मेरे इस कातर भूले हुए मन को
मोहने, कोई और नहीं आया उसी खुले आसमान के टुकड़े ने मुझे
फिर से लुभाया। दुख मेरा तब से कितना ही बड़ा हो
वह वज्र सा कठोर, मेरी राह में अड़ा हो
पर उसको बिसराने का,सुखी हो जाने का, साधन तो वैसा ही
छोटा सहज है। वही चिड़ियों का गाना कजरारे मेघों का नभ से ले धरती तक धूम मचाना
पौधों का अकस्मात उग आनासूरज का पूरब में चढ़ना औ पच्छिम में ढल जाना
जो प्रतिक्षण सुलभ, मुझे उसी ने लुभाया मेरे कातर भूले हुए मन के हित
कोई और नहीं आया दुख मेरा भले ही कठिन हो
पर सुख भी तो उतना ही सहज है मुझे कम नहीं दिया है देने वाले ने कृतज्ञ हूँ
मुझे उसके विधान पर अचरज है।

nature

प्रेम !
चाहत नहीं सम्मान की होए भले अपमान,
क्या खोया ?क्या पाईया नहीं प्रेम पैमान!
मन का अँधियारा मिटा जीवन बना महान,
लगन की लौ अन्दर !जगी दीप प्रेम तू जान ?
छमा समायी प्रेम में अतुलित बल की खान,
हर विपदा पल में हटे प्रेम ले जो ठान,
प्रेम मन की कल्पना साहस भरी उडान,
सत्य उचाई का शिखर छोटा लगे जहान,
प्रेम है एक आराधना सफल साधना ज्ञान,
बिना प्रेम के सत्य कह संभव नहीं पिय ध्यान!
एक किरन सूरज की देती
है सारे जग को उजियारा
एक दीप माटी का जल कर
पी लेता सारा अँधियारा

एक बूँद सीपी में ढल कर
बन जाती है सच्चा मोती
एक सत्य में बड़े झूठ से
लड़ जाने की ताक़त होती

एक धरा है एक गगन है
एक सुनो ईश्वर कहलाता
मिल-जुल सबसे करो प्यार तुम
बड़ा एकता का है नाता......



















धूप के खूबसूरत टुकड़े पिघलने के लिए
कोई भी जगह हो सकती है
उसके तन पर एक जगह है
जहाँ रखे जा सकते हैं ओंठ
जहाँ रखे जा सकते हैं कुछ लफ्ज़
एक सुंदर तस्वीर की तरह
सूरज डूब रहा है-
गहरे सुनहरे हो रहे हैं मन के रंग
किरणें रंग रही हैं हर चीज़

तस्वीर में कोई ! बैठी है
अकेली निरंतर किसी तेज़ सफ़र में
शांति और गति का संगम है
उसका चेहरा दुनिया का अकेला सूर्यमुखी है

विशाल पलकें फूल खिलने की तरह उठती हैं
जीवन के सूर्योदय जैसी गतिविधियाँ
उसके ओंठ धरती के रसों को सम्हाले
उसकी लालिमा जैसे शताब्दियों के सूर्योदय
मेरी धरती का दृश्य
और मैं चल रही हूँ।